पाठ्यक्रम: GS1/जलवायु विज्ञान
संदर्भ
- भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून आगामी एक सप्ताह तक कमजोर अथवा लगभग स्थिर स्थिति में रह सकता है, क्योंकि एक ही समय में वर्षा को दबाने वाले पाँच प्रमुख कारक सक्रिय हैं।
परिचय
- 1 जून से 17 जून के बीच भारत में देशव्यापी वर्षा में 38 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जबकि मध्य भारत में सर्वाधिक 62 प्रतिशत वर्षा घाटा देखा गया है।
- वर्षा को प्रभावित करने वाले पाँच प्रमुख अवरोधक कारक निम्नलिखित हैं—
- एल नीनो की विकसित होती परिस्थितियाँ
- मैडेन-जूलियन दोलन (MJO) की कमजोर सक्रियता
- शुष्क पछुआ (पश्चिमी) पवनें
- कमजोर सोमाली जेट
- हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) की तटस्थ अवस्था

दक्षिण-पश्चिम मानसून
- आगमन एवं वापसी: भारत में मानसून ऋतु सामान्यतः जून के प्रारम्भ में आरम्भ होकर सितंबर तक रहती है।
- मानसून का आगमन दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी पवनों के प्रवेश से चिह्नित होता है, जो हिंद महासागर से आर्द्रता युक्त वायु लेकर आती हैं।
- मानसून की वापसी अथवा प्रत्यावर्तन सामान्यतः अक्टूबर माह से प्रारम्भ होता है।
- अक्टूबर से दिसंबर के बीच सक्रिय रहने वाला उत्तर-पूर्व मानसून दक्षिण भारत के कुछ भागों में वर्षा प्रदान करता है।

मानसून को प्रभावित करने वाले कारक
- एल नीनो : स्पेनिश भाषा में एल नीनो का अर्थ “छोटा बालक” होता है। यह एक जलवायु संबंधी परिघटना है, जिसकी विशेषता मध्य एवं पूर्वी विषुवतीय प्रशांत महासागर में समुद्र सतह के तापमान में समय-समय पर होने वाली असामान्य वृद्धि है।
- एल नीनो की स्थिति में व्यापारिक पवनें कमजोर पड़ जाती हैं।
- इसके परिणामस्वरूप गर्म जल पूर्व दिशा की ओर, अर्थात् अमेरिका के पश्चिमी तट की ओर विस्थापित हो जाता है, जबकि अपेक्षाकृत ठंडा जल एशिया की ओर प्रवाहित होता है।

- मौसम प्रतिरूपों पर एल नीनो का प्रभाव: वैश्विक तापमान में वृद्धि करता है।
- मानसून को कमजोर बनाता है।
- वनाग्नि की संभावनाएँ बढ़ाता है।
- चक्रवातों, हरिकेनों तथा अन्य चरम मौसमीय घटनाओं को प्रेरित करता है, विशेषकर प्रशांत एवं अटलांटिक महासागरों में।
मैडेन-जूलियन दोलन (MJO)
- MJO पवनों, बादलों तथा वायुदाब का एक गतिशील तंत्र है, जो विषुवत रेखा के चारों ओर परिभ्रमण करते हुए वर्षा उत्पन्न करता है।
- इसकी खोज वर्ष 1971 में रोलैंड मैडेन और पॉल जूलियन द्वारा की गई थी।
- यह तंत्र पूर्व दिशा की ओर लगभग 4–8 मीटर प्रति सेकंड की गति से संचालित होता है तथा सामान्यतः 30–60 दिनों में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है, हालांकि कभी-कभी इसमें 90 दिन तक लग सकते हैं।
- गतिशीलता के दौरान MJO की प्रबल सक्रियता पृथ्वी को सामान्यतः दो भागों में विभाजित कर देती है—
- एक भाग, जहाँ यह सक्रिय अवस्था में रहकर वर्षा को प्रोत्साहन देता है।
- दूसरा भाग, जहाँ यह वर्षा को दबाता है।
- गतिशीलता के दौरान MJO की प्रबल सक्रियता पृथ्वी को सामान्यतः दो भागों में विभाजित कर देती है—
- सक्रिय MJO चरण के प्रभाव: सक्रिय MJO चरण के दौरान प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य से अधिक वर्षा होती है, जिसका कारण है—
- बादलों का अधिक निर्माण
- संवहन में वृद्धि
- चक्रवाती गतिविधियों में वृद्धि

पश्चिमी विक्षोभ
- पश्चिमी विक्षोभ (WD) एक बहिर्उष्णकटिबंधीय मौसमीय प्रणाली है, जिसकी उत्पत्ति भारत के बाहर होती है तथा जो पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर बढ़ते हुए भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भागों में वर्षा, हिमपात और तूफानी परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है।
- उत्पत्ति एवं निर्माण: पश्चिमी विक्षोभों की उत्पत्ति सामान्यतः निम्न क्षेत्रों में होती है—
- भूमध्यसागरीय क्षेत्र
- काला सागर क्षेत्र
- कैस्पियन सागर क्षेत्र
- इनका निर्माण तब होता है जब ठंडी ध्रुवीय वायु उष्ण एवं आर्द्र वायु के संपर्क में आती है, जिससे निम्न दाब प्रणालियाँ विकसित होती हैं।
- ये प्रणालियाँ ऊपरी वायुमंडल में प्रवाहित होने वाली पछुआ पवनों, विशेषकर उपोष्णकटिबंधीय पछुआ जेट धारा के माध्यम से पूर्व दिशा की ओर अग्रसर होती हैं।
हिंद महासागर द्विध्रुव
- वर्ष 1999 में जापान के वैज्ञानिक एन. एच. साजी ने हिंद महासागर में ENSO जैसी एक परिघटना की खोज की, जिसे हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) नाम दिया गया।
- ENSO की भाँति IOD की भी तीन अवस्थाएँ होती हैं—
- सकारात्मक
- नकारात्मक
- तटस्थ
- सकारात्मक IOD अवस्था: सकारात्मक अवस्था में पश्चिमी हिंद महासागर का समुद्री सतह तापमान अपेक्षाकृत अधिक गर्म होता है, जिससे मानसूनी पवनों को अतिरिक्त ऊर्जा एवं बल प्राप्त होता है।
- नकारात्मक एवं तटस्थ अवस्था: नकारात्मक अवस्था में इसके विपरीत परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
- तटस्थ अवस्था में समुद्री सतह तापमान का कोई उल्लेखनीय अंतर नहीं पाया जाता।
- ENSO की भाँति IOD की भी तीन अवस्थाएँ होती हैं—
सोमाली जेट
- सोमाली जेट एक तीव्र गति से प्रवाहित होने वाली अंतर-गोलार्द्धीय एवं विषुवत रेखा को पार करने वाली वायु धारा है।
- इसकी उत्पत्ति दक्षिणी गोलार्द्ध में मॉरीशस तथा मेडागास्कर के उत्तरी भाग के निकट होती है।
- यह वायु धारा विषुवत रेखा को पार करके अफ्रीका के पूर्वी तट के साथ-साथ—
- केन्या
- इथियोपिया
- सोमालिया से होकर प्रवाहित होती है।
- मई माह के दौरान यह अरब सागर में प्रवेश करती है तथा जून तक भारत के पश्चिमी तट तक पहुँच जाती है।
- मानसून में भूमिका: अपने प्रवाह के दौरान सोमाली जेट महासागर से बड़ी मात्रा में आर्द्रता (जलवाष्प) ग्रहण करती है।
- जब सोमाली जेट अधिक शक्तिशाली होती है, तब यह प्रायद्वीपीय भारत में अधिक तीव्र, व्यापक एवं विश्वसनीय मानसूनी वर्षा लाती है।
Source: DTE
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